भारत एक विविधताओं का देश जहाँ २२ मुख्य भाषाएँ और करीब 780 अन्य/क्षेत्रीय भाषाएँ बोली जाती है। पिछले 50 वर्षो में 250 से भी अधिक भाषाएँ विलुप्त हो चुकी हैं। प्रत्येक भाषा के साथ उस प्रजाति का ज्ञान भी विलुप्त हो जाता है, और न चाहते हुए भी वह देश विकासशील ही बना रहता है क्योंकि वहां के वासी दुसरो की नक़ल करने लगते, कुछ वास्तविक जिसे अपना कह सके, जैसा कुछ अविष्कृत ही नहीं कर पाते। यही कटु सत्य और देश के विकास की बाधा है।
हाँ मैं हिंदी, संस्कृत, मराठी, बिहारी, उर्दू, गुजराती, आसामी, तमिल, बंगाली और भी कई देशज एवं क्षेत्रीय भाषाएँ जनता हू जो पुरातन काल से असीमित ज्ञान खुद में लिए हुए इस पवित्र भूमि पर विचरण कर रही है और देशवासियो को पुकार रही है की कोई इस नवयौवन पीड़ी में सामने आये और अथाह ज्ञान की पूंजी से भरी भाषा को देवकण्ठ में स्थापित करे और फिर यही तो विश्व के कल्याण का मार्ग भी है।
हम स्पेनिश, जर्मन, अंग्रेजी, फ्रेंच और न जाने कितनी तरह की भाषाए सीखते हैं जो हमारी सीखने की काबिलियत को दर्शाती है और ये प्रशंसनीय भी है, किन्तु क्यों न आज परदेसियों को मौका दिया जाए की वो हमसे हमारी भाषा सीखने का प्रस्ताव रखें, ऐसा होने पर विश्वास मानिए आपको अंग्रेजी की २ लाइन बोलने की तुलना में कहीं ज्यादा गर्व का अनुभव होगा।
सारांश यही है की हमारा लक्ष्य खुदको खोकर के सफलता पाना नहीं, अपितु सफलता हासिल करके खुदको विश्व में स्थापित करना है, एक पहचान के रूप में और इसको कहते है 'विकसित' होना।
आपका दिन मंगलमय हो!
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