Wednesday, 2 September 2015

सत्य के निकट

जीत क्या है, हार क्या है,
ये तो जीवन का एक उपहार है, भाग्य का उपकार है। //१

माला जो पिरो दी तो ये एक सुन्दर हार है,
जो मोती गिर पड़े तो ये जीवन का प्रतिकार है। //२

चहुँ-ओर जय-पराजय का जैसे एक हाहाकार है,
अरे बस करो ये तो बस एक माया का अन्धकार है।  //३

जो हार-जीत को समान रूप से करता स्वीकार है,
वो ही तो धारण करता विजयी होने का अधिकार है।  //४

रात्रि के प्रहारों में दीप के प्रकाश में कीट करता विहार है,
प्रकाश में ही गिनता अपने अंतिम क्षण, जल जाना उसे स्वीकार है। //५

जितना जी ले कीट उतने ही समय की जयजयकार है,
जो जल के भस्म हो जाये तो लौ की जयकार है। //६

ये दीप जो बुझ जायेगा तब उस अन्धकार की सरकार है,
जीत क्या है, हार क्या है, बस समय की ललकार है। //७

जो हार-जीत को समान रूप से करता स्वीकार है,
वो ही तो धारण करता विजयी होने का अधिकार है।  //८

(src:www.ibtl.in)

1 comment:

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